देख नम के बादल,
दिल हो गया घायल
मन में मची हलचल
हृदय हो रहा बेकल
चूँकि अम्बर में है घटा छाई,
आज फिर उसकी याद आई!
हल्की बूँदों का फुहार
यदा-कदा मूसलाधार
दिल हो रहा बेकरार
देख दृश्य का बहार
कार्यस्थल से आवाज आई
कि आज फिर उसकी याद आई!
बदन में उठती सिहरन
हवा टकराती निरंतर
करने उसे आलिंगन
तड़प उठता है मन
मौसम ने है मदहोशी लाई
आज फिर उसकी याद आई!
देख यही काले जलद
थिरकते हैं मयूर पद
प्रियतम पर मद
का नशा जाता है लद
पर जब याद आती हो विदाई
आज फिर उसकी याद आई!
मन कहता ए जलधर
मेघ-दूत सावन कर
ले कर जा मेरा संदेश
पहुँचा दे उसके देश
प्रेम की याद में आती है रुलाई
आज फिर उसकी याद आई!
~जवाहर लाल भगत~
लेखक परिचय : यह कविता कवि की पौत्री प्रियदर्शिनी के माध्यम से हमें प्राप्त हुई | वे हमे बताती हैं-
” कविताएँ मेरे दादाजी की लिखी हुई हैं — उन दादाजी की, जिनके साथ जुड़ी मेरी बचपन की सबसे खूबसूरत यादें आज भी मेरे दिल में वैसे ही जीवित हैं। दादाजी बहुत अनुशासित और समय के पाबंद इंसान थे। उनकी हर सुबह मॉर्निंग वॉक से शुरू होती थी, और बचपन में मैं अक्सर उनके साथ जाया करती थी। रास्ते में वे मुझे छोटी-छोटी चीज़ें दिलाते, बातें करते, और पता ही नहीं चलता था कि कब वो साधारण-सी सुबह मेरे लिए एक याद बन जाती थी।
उन्हें घूमने-फिरने का बहुत शौक था। साल में एक-दो बार पूरा परिवार कहीं न कहीं घूमने जरूर जाता था, और उन यात्राओं में दादाजी की मौजूदगी सबसे खास होती थी। शाम को वे अपने दोस्तों से मिलने जाते, हँसते-बोलते, और घर लौटकर फिर उसी अपनापन से हम सबके बीच बैठ जाते।
लेकिन शायद उनकी सबसे खूबसूरत दुनिया उनकी लिखी हुई कविताएँ थीं। वे अपने विचारों, भावनाओं और जीवन के अनुभवों को शब्दों में बहुत सहजता से उतार देते थे। उनकी कविताओं में कभी जीवन की सच्चाई है, कभी रिश्तों की गर्माहट, तो कभी मन की गहराई।
दुर्भाग्य से उनकी रचनाएँ उनके रहते कभी प्रकाशित नहीं हो सकीं। आज उनकी कविताओं को प्रकाशित करना मेरे लिए दादाजी को फिर से महसूस करने जैसा है। ऐसा लगता है जैसे उनके शब्दों के माध्यम से उनका एक हिस्सा आज भी हमारे बीच जीवित है।
मैं बस इतना चाहती हूँ कि जैसे उनकी बातें और उनका स्नेह हमारे जीवन को छू गया, वैसे ही उनकी कविताएँ भी हर पाठक के दिल तक पहुँचें।”
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