दीपक की दिनकर से बात….
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कम्फ़र्टर
अगली बार जब हम मिलें,…
तुम हो मेरे अंतर्मन में
अतिथि : तुम हो प्रकट आभास में..
बातें कुछ अनकही सी!
वैष्णवी : मैंने सुनाये हैं किस्से चाँद को तेरे…
जुनूनी तूफ़ान…
तपस्या : अब देखो यारो कहां मैं?
दशानन का दंभ
पलक की कविता रावण के शिथिल अभिमान पर …
स्वयं से मुलाक़ात…
कोमल की कविता : फिर से स्वाभिमान उठा….
तुम ख़ूबसूरत हो !!
साक्षी : बेइंतहा उल़्फत निभा सके कोहरे के तले
माँ तू भी कमाल करती है!
माँ को समर्पित आयुषी की कविता..
रंग दिखेंगे…
तू एक एक ईंट जोड़…