सर्दियाँ और यादें…

सर्द हवा का झोंका,
अनकही उम्मीदों का धोखा,
घास पर ओस की बूँद,
अहसासों तले यादों की गूँज,

धुंधला शर्माता सूरज,
ठिठुरता सिकुड़ता धीरज,
दूर जलती आग,
पास सुलगते जज़्बात,

कोहरों का घर बना,
कि दिल मेरा फिर उमड़ पड़ा,
जाऊँ मैं किस गली,
एक मोड़ पर ठहर गया,

ये सर्दियाँ, वो सर्दियाँ,
मैं उनका बन कर रह गया।

सर्द फ़िज़ा में उड़ता,
गर्म साँसों का धुआँ,
भीगी पलकों में सहमा,
ज़िद भरा कोई सपना,

सरसराती सड़क पर,
पड़ी कुछ सूखी पत्तियाँ,
बर्फ़-सी ज़मीं,
हाथों की ये धमनियाँ,

विलाप भी राग सा लगे,
मन बावरा दौड़े-भागे,
रूह को मिलता सुकून ये कैसा,
लगे सब कुछ ख़्वाबों जैसा,

ये सर्दियाँ, वो सर्दियाँ,
मैं उनका बन कर रह गया।

बीती रात की कनकनी सर्द,
मिटा गई दूरियों का दर्द,
भींगे शीशे से वो ख़्वाब,
अभी तक सूखे नहीं,

सरकती-अटकती ओस की चादरें,
उनमें शर्माती बचकानी ख़्वाहिशें,
शाम का सुबह से,
चाँद का सूरज से,
धरती का बादल से,
सपनों का अपनों से,

मिलन कराती सर्दियाँ,
ये सर्दियाँ, वो सर्दियाँ,
मैं उनका बन कर रह गया…

~रजनीश रंजन~

रजनीश रंजन जीवन की आपा धापी में जब कुछ ठहराव ढूंढते हैं, किताबों, कहानियों, कविताओं, कलम और अपनी जन्म-भूमि बेतिया को अपने मन के करीब पाते हैं | पढ़ाने और खाने के शौक़ीन, पुत्र, पिता, पति, भाई और सचिन तेंदुलकर के प्रगाढ़ प्रसंशक

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