स्त्री – एक पहर

अंगड़ाई लेती, ज़ुल्फ़ें समेटती;
हसीं मुस्कुराहट लिए याद करती,
निगाहें चेहरे से मिलाती,
जल स्पर्श से उज्ज्वलित होती|

ममता के आँचल में दुलारे को लपेटे,
स्नेह से सहलाते गोद में लिए,
उसके सपने सक्रिय करने हेतु,
निद्रा से सचेतना का बनाती वो सेतु|

हया से, आशा से पुकारती अपने संगी को,
कदापि विलम्भ न हो जाये किसी को,
महकता है आशिआना उसकी गूँज से,
सदस्य जुट जाते हैं स्फूर्ति से|

यह शक्ति है समाज की,
लक्ष्मी है आवास की,
रति है काम की,
नारी है कुल की|

अज्ञात है इसकी ऊर्जा का स्त्रोत,
समावेश करते प्रेम व क्रोध,
भावावेश में गुज़रे, चैन न एक पल की,
कामना इसकी है केवल एक प्याली चाय फुर्सत की….

~विजय छाबड़ा~

विजय एक ख़ुशक़िस्मत इंसान हैं जो महत्वाकांक्षी एवं कार्यरत हैं | महफिल तथा संगीत से अपार प्रेम है और आशावादी दृष्टिकोण से समाज समझते हैं |

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