शौक़-ए-इंक़लाब

मुट्ठी भर सनकी थे जिनसे,
चरमरा गया था तख़्त फ़रेबी,
समझ से सनकी, बनते क्यों नहीं?
तुम्हें शौक़ था इंक़लाब का,
अब इंक़लाब करते क्यों नहीं?

फिर अजब सा मंज़र है,
हर हर्फ़ ग़लत, हर ज़र्फ खँजर है,
खँजरों को खँजर- खँजर, करते क्यों नहीं?
तुम्हें शौक़ था इंक़लाब का,
अब इंक़लाब करते क्यों नहीं?

ऐसा करते! यह हो जाता!
वैसा करते! वह हो जाता!
बस सोचते हो, करते क्योँ नहीं?
तुम्हें शौक़ था इंक़लाब का,
अब इंक़लाब करते क्यों नहीं?

गुज़रा वक़्त वहीं ठहरा पाया है,
क़ानून सितम का ही हमसाया है,
रवायतें बेमानी, बदलते क्योँ नहीं?
तुम्हें शौक़ था इंक़लाब का,
अब इंक़लाब करते क्यों नहीं?

पल है बेबस, पहर बेहाल ख़स्ता है,
तंग हो चली साँसें, घुटन सरबस्ता है,
दीवारों में नये रोज़न, गढ़ते क्यों नहीं?
तुम्हें शौक़ था इंक़लाब का,
अब इंक़लाब करते क्यों नहीं?

इशरत-ए-रूह जिस्म को तन्हा करना,
फितरत-ए-जिस्म राख-ओ-फ़नाह होना,
ख़ातिर ख़ाक़-ए -वतन ‘समर’, मरते क्यों नहीं?
तुम्हें शौक़ था इंक़लाब का,
अब इंक़लाब करते क्यों नहीं?

~समर~

समर भीड़ में उलझा हुआ एक चेहरा है |

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