इसलिये


रोज़ रोज़ की कविता से मैं तंग आ चुका था| मुझे इस बात का विश्वास होने लगा था कि मेरे लिखने या न लिखने से कुछ नहीं होने वाला है| दुनिया जैसी है वैसी ही रहेगी| समाज ऐसा ही रहेगा| मैं भी ऐसा ही रहूँगा| रूढ़ियाँ, जग में व्याप्त निराशा, हताशा- सब वैसा ही रहेगा| शब्द निरर्थक हो चले थे| मायूसी का कोहरा था, उजाले से पीड़ित अँधेरा था|

मेरे अपने मुझसे दूर जा रहे थे| और मैं देख रहा था उन्हें- अपनी मुठ्ठी से फिसलती हुई रेत कि तरह| मुठ्ठी कसने से डर लगता था कि कहीँ रेत और तेज़ी से न फिसल जाये| जिन स्तंभो पर मेरा बचपन टिका हुआ था वह हिलने लगे थे और और मैं इतना अबोध नहीं रह गया था कि इससे अनभिज्ञ रह सकता | मैं वैसा नहीं जैसा संसार ने सोचा था कि मुझे होना चाहिए| लेकिन संसार भी तो वैसा नहीं जैसा मैंने सोचा था कि उसे होना चाहिए| इन दो बातों की ग्लानि और द्वेष क्रमशः मुझे सताते रहते|

रोज़ वही भागदौड़, सुबह- शाम की कश्मकश, सही-ग़लत का असमंजस और अखबार में होती अनहोनियां| क्या यह जीवन सच में जीने योग्य है? और अगर नहीं है तो क्यों नहीं है और हम क्यों जीवित हैं? मैं हर समय यही सोचता रहता था| कुछ भी, कोई भी, कही भी ख़त्म हो जाता था- बस खबर आती थी और उसके बाद एक क्षणिक शुन्य| फिर जीवन अपने पुराने ढर्रे पर चलने लगता था| इसमें जीने लायक़ क्या था?

लिखने का कुछ मन नहीं करता था| क्यों लिखूं? क्या हो जायेगा? कौन सा पहाड़ टूट जायेगा?

लेकिन लगा लिखना ज़रूरी है- जग के लिए नहीं, समाज के लिए नहीं, रूढ़ियों की निंदा के लिए नहीं, मायूसी के कोहरे में व्याप्त हताश निराशा के लिए नहीं- खुद के लिए|

इसलिये मैंने यह लिखा…


~समर~

समर भीड़ में उलझा हुआ एक चेहरा है |

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