एक नदी की बात थी…

बह चला समन्दर
पिघलता गया आसमां
रोम रोम, कोर कोर
ज़ार ज़ार, ख़ाक ख़ाक।

अब
जब काल लिख चुका,
अपनी कठोर तम कल्पना,
कलम चाहे समेटना,
क्या था- जो था, जो न रहा…

एक नदी की बात थी,
जो कभी तालाब थी;
किसी गाँव के चौक पे,
बड़े चाव ओ शौक़ से;
जिसे कोम्पलों से प्यार था,
नौनिहालों से लगाव था…

मुड़ चली नदी संवर ,
नगर तरफ़ दालान से,
सही रही वो हर परब,
मंदिरों के मान से|

सांवले से हाथ में,
अनगिनत –
मिसरी, चूड़ी, टिकरियां
चाँदी बालों बीच में ,
कुछ तस्वीर जिनमें बिंदिया-
ठहरा वहीँ पे बचपन है,
हर पल वहीँ पे नटखट है…

था स्नेह जिनसे उम्र भर,
उनसे ही सारा तंज़ सहा,
चीखे, डांटे, चिल्लाये सब,
हर वज्र फिर भी हंस सहा…

रात वो भी आ गयी
ठिठक गयी सब मर्ज़ियाँ
देखते ही देखते
गुम्म गयी सब मिश्रियाँ…

वो बढ़ चली एकाग्रचित्त
अब तोड़ सारे बंधनों
साँसों परे चलना था जो
अब छोड़ सारे परिजनों,

बह चली, वो नदी
जो कभी तालाब थी
बह चला समन्दर
पिघलता गया आसमां
रोम रोम, कोर कोर
ज़ार ज़ार, ख़ाक ख़ाक।

ठहाके सारे झूठ हैं,
ये सिसकियों के रूप हैं..

है संसृति यही अगर –
तो है ही क्यों ये फिर मगर ?
ये ज्ञान किसको ज्ञात है ?
हर नदी की बात है…
जो अभी तलाब है …

~समर-सोनू ~

समर भीड़ में उलझा हुआ एक चेहरा है |

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