दो दोस्त

एक गाँव में दो दोस्त रहते थे। एक जाति से पंडित और दूसरा बनिया । दोनों के एक-एक लड़के। दोनों बच्चों में भी दोस्ती थी। बनिए ने अपने पुत्र को शहर अपने भाई के पास भेज दिया। सोचा शायद पढ़ लिख लेगा ये भी किसी काम में ही लग जाएगा। कैलाश का पढ़ाई की तरफ रुझान हो गया। दिमाग से बेशक तेज़ नहीं था पर अपनी मेहनत से अपने ज्ञान को एक अच्छे स्तर पर ले आया था। तर्क वितर्क की कला भी विकसित हो रही थी।

छुट्टियों में एक बार कैलाश गाँव गया। बहुत दिन बाद गाँव जाकर उसे अच्छा लगा। अपने बचपन के मित्र रमन को मिल फूला ना समाया। पूरे एक साल बाद अपने मित्र से मिला था।

हफ्ते दस दिन बाद कैलाश ने रमन से कहा —
“मैं देख रहा हूँ तुम अलग रंग के कपड़े पहनने लगे हो।”
“क्यूँ, अच्छा नहीं लगता क्या?”
“अच्छा तो है, पर तुम्हारा यह शौक कब से बन गया?”
“अरे माँ कहती हैं, शिवजी नीलकंठ हैं, भगवा हनुमानजी का, लाल सुनहरी माता की और काला रंग शनि देव का। पीला साईं बाबा का। जब हर रंग भगवान से जुड़ा है तो हम क्यूँ नहीं पहन सकते।
इसलिए मैं सोमवार को नीला, शनिवार को काला, मंगल को लाल, इस तरह से कपड़े पहनता हूँ। इसमें क्या गलत है?”
“बात तो सही है। पर रंगीन कपड़े सिर्फ इसलिए डालना क्यूँकि भगवान से जुड़े हैं, क्या यह ठीक है?”
“पर अगर इस बहाने से भगवान याद आए तो इसमें क्या गलत है?”
“गलत नहीं है पर अपनी सोच को क्यूँ बाँधना? थोड़ा इस बंधन तोड़ो।”
“तो मैं रंगीन कपड़े डालना छोड़ दूँ?”
“मैंने ऐसा नहीं कहा। बस इसे भगवान से मत जोड़ो। शायद तुम इसे अंधविश्वास से न जोड़ो, पर तुम्हें देख, जो तुम जितना समझदार न हो, अंधविश्वास और दकियानूसी विचार की तरफ चल पड़े, गलत होगा। थोड़ा बदलो अपने आप को।”

कुछ देर बाद दोनों चल पड़े। पर रमन के मन में कैलाश की बात घर कर गई थी। वह सोच रहा था कि कैलाश बदल गया है। उसकी सोच बदल गई है। शहर जाने का उसे कितना फायदा हुआ है। उसने फैसला किया कि वह अपनी सोच को क़ैद कर के नहीं रखेगा।

अगले दिन शनिवार था। रमन ने हरे कपड़े निकाले। वह बहुत प्रसन्न था। उसे महसूस हुआ कि आज वो किसी गिरफ्त से निकला है। उसने सोचा कैलाश उसे देख बहुत खुश होगा। वह दौड़कर कैलाश के घर गया। कैलाश की माँ ने बताया कि वह कुछ लड़कों के साथ बाज़ार से जलेबी रबड़ी लाने गया है।

ज़रूर वह लल्लू मिठाईवाले की दुकान पर होगा। रमन भी उस ओर निकल पड़ा। कैलाश और उसके साथी लल्लू की दुकान के बाहर पड़ी मेज़ पर बैठे थे। रमन दौड़ता हुआ गया और कैलाश के सामने जा खड़ा हो गया।
कैलाश बोला — “क्या बात पंडितजी, हरा कपड़ा पहने हो, शनि महाराज कहीं नाराज़ हो गए तो उनका प्रकोप कैसे झेलेंगे?”

यह सब सुनते ही सभी ठहाके लगा हँसने लगे। रमन की आँखों से आँसू टपक पड़ा। अपना उपहास होते देख वह लज्जित हो गया। सहसा ही उसके मुख से मुस्कुराहट चली गई। उसने सर झुका लिया और सोचने लगा कि क्या कैलाश अब मेरा दोस्त नहीं रहा?

“कैलाश तुम सचमुच बदल गये हो।” बोलकर रमन अपने घर की ओर चला गया।

पीछे कैलाश अपने दोस्तों के साथ जलेबी का लुत्फ़ उठाता रहा…

~सरबजीत सिंह ढींगरा~

सरबजीत को कार चलाना, तैराकी और सपनों को पूरा करना अच्छा लगता है| ख़राब से ख़राब चुटकुले को हास्यास्पद बना देना उनका विशेष गुण है | दिलचस्प बात यह है कि वे कभी कभी हास्यपद चुटकुले को भी ख़राब कर पाने में सक्षम हैं ! जज्बे, उमंग और कद में हमेशा ऊचें, उनके समीप रहने पर कोई भी क्षण आप उबाऊ नहीं पाएंगे| दिल से बच्चे, मन से जिज्ञासु और लक्ष्य प्राप्ति के प्रति सदैव अडिग, आप उन्हें sarabjeet.dhingra@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं|

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