एक अंधेऱी ,
सावन की रात ,
आधा छुपा ,
बादलों में चाँद ,
कुछ ही ,
टिमटिमाते तारे ,
सुनसान पथ ,
विस्मित, दिग्भ्रमित,
अनजान पथिक |
नभ से गिरती दों बूंद ,
पथिक को सागर सी लगती,
जीवन का सच ढूंढ़ता,
बूँदों से वो बातें करता,
पल में वो गायब हो जाती,
सहमा पथिक नभ को तकता ,
आधा चाँद , कुछेक तारें,
अब भी स्थिर अडिग वहीँ,
बूँदों का रहस्य जान कर,
उन्हें सपनों सा मानकर ,
पथिक फिर आगे बढ़ता।
और गहरी हो जाती रात,
बादल हुए जाते घनघोर ,
हर तरफ़ स्वानों की भूँक ,
अँधेरा डसने को आता ,
आशंकित पथिक ,
ख़ुद को काँपता पाता,
नभ को ताकता वो बेचारा ,
विलुप्त हुए तारे सब ,
चाँद का भी पता नहीं|
पथ दिखलाए कौन?
कोई तो सहारा नहीं|

दो मेघ तब टकराते हैं ,
बिजली बन उस पथिक को ,
राह वही दिखलाते है ,
कौंधी फ़िर से आशा कोई ,
मंज़िल का पता नहीं ,
पर पथ पाने के उल्लास में
रात के सन्नाटों को चीर ,
संकट के बादलों से लड़ ,
मुग्ध पथिक बढ़ता ही जाता है|
उसका उन्मुक्त बढ़ना,
मेघों को अब रास नहीं,
क्रोधित और भी गरज़ते ,
रात अंधेरें की कोख में-
छुपती जाती,
पथिक का साहस कम ना होता;
थक हार मेघ सारे ,
जिसने पथ दिखलाया था,
अब वही बाधक बनने,
बारिश बन टूट पड़ते हैं|

सना देख कीचड़ो में,
पथ सारा अब,
बादल, बिजली, रात सब,
अपने अहम् का दंभ भरते;
पर ठहरेगा अब एक पल नहीं,
चलता चल पथिक अब,
उजाले में अब देर नहीं ,
सूखेंगे ये बादल सब,
टूटेंगे ये अंधल अब,
दिवाकर ये सब देख रहा हैं,
नतमस्तक वो पथिक की सुनता है,
अँधेरों को चीर सुबह बनता है,
पथिक पहुँच मंज़िल पर,
अब मंद मंद मुस्काता है।
मंद मंद मुस्काता है ……

~रजनीश रंजन~
रजनीश रंजन आई.टी क्षेत्र में कार्यरत हैं | जीवन की आपा धापी में जब वे कुछ ठहराव ढूंढते हैं, किताबों, कहानियों, कविताओं, कलम और अपनी जन्म-भूमि बेतिया को अपने मन के करीब पाते हैं | पढ़ाने और खाने के शौक़ीन, पुत्र, पिता, पति, भाई और सचिन तेंदुलकर के प्रगाढ़ प्रसंशक…
brilliant
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Thank you Ashwniji.
Regards,
Team GoodWill
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