मेरे बाद….


अस्तित्व मेरा जब ख़ाक बने,
काया जल -जल राख़ मिले ,
मातम से उजड़ी मांग न हो,
श्राद्ध न हो, पिंड – दान न हो;
न मिटे माथे की रोली,
न टूटे छन से कोई चूड़ी,
ममता न करे विलाप,
न दूज पर हो कोई विषाद,
शोकागुल कोई सभा न हो,
भीड़ मेरे घर जमा न हो।

मौत नहीं करती जितना-
जग रीति मृत कर जाती है,
“आह भला था। आदमी सधा था!”
सांत्वना ही शोक लिप्त कर जाती है।
न हो ऐसा कोई भी पद्य-
न बड़बड़ाए कोई कौन है सत्य।

एक लम्हा था जो बीत गया,
काल फिर क्षण पर जीत गया;

लोरी-ठिठोली में;
सावन- गीतों में,
दीवाली-दीपों में,
खन -खन, छन -छन में,
बिंदी दमक में,
राखी चमक में,
होली भसड़ में,
हृदय में, अधर में,
हर जश्न , हर पहर में,
न हो ऐसा कुछ भी-
जो होता है किसी के गुज़रने के बाद,
अमर रखना मुझे मेरे बाद…..
.

~समर~

समर भीड़ में उलझा हुआ एक चेहरा है |

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