मेरी डायरी

सब जगह से हार कर
जब इन वादियों में सुकून पाया,
मेरा साथ मेरी डायरी ने निभाया;
हँसना, रोना, खिलखिलाना, गिड़गिड़ाना
क्या नहीं किया?
लेकिन तुमने हमेशा साथ दिया;
तकलीफ, ख्वाहिशें और जज़्बातों से भरे
इन पन्नों ने हमेशा एक अनकहा सा वादा निभाया;
जब-जब मैंने खुद भी अपनी तकलीफों को नजरंदाज किया,
तुमने गले से लगाया;
जब दिल थक गया इस बाहरी खामोशी से…

~अदीबा ख़ान~

लेखिका परिचय : मेरा नाम अदीबा ख़ान है। मैं मेडिकल कॉलेज के अंतिम वर्ष की छात्रा हूँ। मैंने लिखना तब शुरू किया था जब मैं जूनियर स्कूल में थी। लेकिन स्कूल खत्म करने के बाद मैं अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गई। हाल ही में, छुट्टियों के दौरान जब मैं अपनी अन्य रुचियों (जैसे पेंटिंग, कैलिग्राफी आदि) में व्यस्त थी, तब मुझे फिर से लिखने की प्रेरणा मिली। मैंने अपनी पहले लिखी हुई कुछ कविताएँ ऑनलाइन पोस्ट कीं और वे प्रकाशित भी हो गईं। यह मंच हम जैसे लेखकों के लिए वास्तव में बहुत सहायक है।

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