माया की आग में,
जलती सोने की लंका;
अहंकार में डूबा उसका राजा,
पतन निश्चित था उसका फिर भी,
राम के आगे न झुका उसका राजा|
जल गई सोने की लंका,
फिर भी डूबा था राजा;
अपने ऐश्वेर्या के घमंड में,
पार न कर पाया एक रेखा को;
मानता खुद को सर्वशक्तिमान ,
उसके माया के अहंकार ने,
कर दिया उसके माया का नाश,
और उसके अहंकार ने कर दिया
उसका नाश |
शनि था जिसके पैरो तले,
आज वो लंकापति स्वयं पड़ा है धूल में,
एक बार फिर जल गई-
सोने की लंका आग में ;
अहंकार ने बदल दिया
एक राज को राख में
जो स्वाभिमान बदला अभिमान में –
कोई न बचा पाया लंका को,
इस भीषण तूफान से ।।
~पलक मिश्रा ~
पलक उत्तर प्रदेश से हैं | उन्हें लिखने और गाने का शौक़ है | उन्हें लोगों की मदद करने में भी बहुत अच्छा लगता है |
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