समाज और मर्द

हमारे समाज में जिस तरह लड़कियां बंदिशों की शिकार है उसी तरह लड़के उम्मीदों के बोझ तले दबे होते है। यह कविता इसी सामाजिक विचार पर आधारित है —

जब आते हैं इस दुनिया में, तो हर कोई रोता है,
फिर कौन आकर सिखा गया कि “मर्द को दर्द नहीं होता है” I

“तुम खिलते रंग मत पहनना, वो तो लड़कियो का काम है,
अपने मन की करने मत रुक जाना, तुझपे तो जिम्मेदारियां तमाम हैं।
दिखना है ताकतवर, बनना है समझदार, झेलना तूझे समाज का दबाव है,
अरे शाम तक भूल जाएगा, क्या मतलब मानसिक तनाव है!”

तू रो नहीं पा रहा है, बैठा है ग़मों के बीच,
क्यूंकि किसी ने मर्दानगी की झूठी तस्वीर जो दी खींच।

अक्सर घरों में देखा जाता है कि लड़कियों पर रात में बाहर निकलने पर बंदिश लगा दी जाती है जबकि लड़कों पर ऐसे कोई नियम नहीं होते। उस पर लिखा है —

कि माना तू आज़ाद है निकलने को घर से, जबकि आधी रात है
पर तेरे अंदर ही कैद रह गई, तेरे मन की जो बात है।

इन मान्यताओं के उत्तर में आगे कहा है—

जीने के सबके अपने तरीके और अपने ढंग है
सुन, तुझपे भी है जंचते, ये जो सारे रंग है
तू बांट ले अपने दिल की तेरे ग़म का भी मोल है,
तू कोशिश तो कर, सुनेंगे हम भी, जो तेरे बोल है।

अगर तुम चाहो तो एक नया आगाज़ कर सकते हो,
पलकों के बांध से अपने दर्द को आज़ाद कर सकते हो ।
वैसे भी अपनी भावनाओं को छिपाना, कौनसा किसी भगवान ने बताया था,
अरे! सुदामा से प्रेम तो कृष्ण ने भी रोकर जताया था ।

बहे थे अश्रु राम के भी, खाये जब शबरी के जूठे बेर थे,
किया था तांडव सती के लिए शिव ने, ये सब समय के फेर थे।

है कौन मनुष्य ऐसा जो विफलताओं से है मिला नहीं?
फिर तूने क्यों ये सोच लिया, तू कर सकता शिकवा–ओ –गिला नहीं?

अरे इस दुनिया की तो समानता की परिभाषाएं भी असमान है,
कर शिकायत, बांट ले अपने दिल की,

तू आदमी से पहले इंसान है

~चयांशी जैन~

Introduction of Chayanshi : I've done my B.Sc. then opted for M.A. pursuing my interest in Political science. A selective introvert and I love to express myself with a little bit of exaggeration and a little too much of sarcasm.

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