अभी जो थक गए हम सदा ,
फ़लक़ का भी कसूर नहीं।
भूल जाएँ ये अधुरा वाक़या ,
रिश्ता इतना भी मगरूर नहीं।
अगर रह जाओ दूर कहीं ,
सिला इतना भी कमज़ोर नहीं ।
ख़तम होगी इंतजार की रात भी ,
सुबह इतनी भी मजबूर नहीं।
खूब रंग लम्हों से चुराया अभी,
शब्द़ो से रुठी इतनी भी शाम नहीं।
इबादत का गीत भी है पिरोया,
आईने से अब कोई भी ग़िला नहीं..
~साक्षी चंदनकर~
साक्षी चंदनकर एम.बी.बी.एस कि पढ़ाई कर रही हैं । लिखने का प्रयास भी बचपन से शुरू किया | अक्सर जो बात कह नहीं पाती उसे शब्दों में पिरोकर लिख देती हैं । हाईस्कूल के दौरान उन्होंने कविताओं से विराम लिया था | फिर एम.बी. बी.एस की शुरुआत में एक शाम अपने जीवन का अनुभव फिर एक पन्ने पर उतार दिया । छुप- छुपकर फिर उन्होंने लिखना शुरु किया | जब उनकी एक कविता की दोस्तों ने प्रशंसा की, उनमें आत्मविश्वास जागृत हुआ| फिर अपने लेखक बनने के ख़्वाब को चुना और अब वे अपने दोनो क़िरदार- लेखक हो या वैद्यकिये पढ़ाई, बहुत ख़ूब निभाती है। एक अनकही बातों का कारवाँ उनके blog- “अबोल “मे शामिल है ।
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