दस्तक- ए -उम्मीद

लफ़्ज़ों में छुपी दास्ताँ ,
कौन समझ पाया?
आंखों में ख़ूबसूरत ग़ज़ल ,
कौन पढ़ पाया?
लहरों को किनारों से ,
कौन बचा पाया?

मसरुफ़ यादों के पन्ने ,
कौन भुला पाया ?
खिड़की से झाँकती किरणे ,
कौन रोक पाया ?
बारिश के लम्हे दोहराने की ख़्वाहिश ,
कौन पूरी कर  पाया?

फ़लक से अधूरा चाँद,
कौन छीन पाया ?
आईने में झलकती सच्चाई,
कौन पौंछ पाया ?
परछाईं का दामन,
कौन मोड़ पाया ?

इश्क़ में इंतजार,
कौन तौल पाया ?
आधी मुलाकातों का शामियाना,
कौन पूरा बुन पाया ?
शबनम से फ़रिश्ते का नूर,
कौन छिपा पाया ?

बेगाने सफ़र की अनजान स्याही,
कौन मिटा पाया ?
जिंदगी की सेज़ पर दस्तक- ए -उम्मीद,
कौन बचा पाया?

~साक्षी चंदनकर~

साक्षी चंदनकर एम.बी.बी.एस कि पढ़ाई कर रही हैं । लिखने का प्रयास भी बचपन से शुरू किया | अक्सर जो बात कह नहीं पाती उसे शब्दों में पिरोकर लिख देती हैं । हाईस्कूल के दौरान उन्होंने कविताओं से विराम लिया था | फिर एम.बी. बी.एस की शुरुआत में एक शाम अपने जीवन का अनुभव फिर एक पन्ने पर उतार दिया । छुप- छुपकर फिर उन्होंने लिखना शुरु किया | जब उनकी एक कविता की दोस्तों ने प्रशंसा की, उनमें आत्मविश्वास जागृत हुआ| फिर अपने लेखक बनने के ख़्वाब को चुना और अब वे अपने दोनो क़िरदार- लेखक हो या वैद्यकिये पढ़ाई, बहुत ख़ूब निभाती है। एक अनकही बातों का कारवाँ उनके blog- “अबोल “मे शामिल है ।

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