मुझमें होके,
मुझसे बना,
फिर भी क्यों?
मुझसे बड़ा-
क्रोध मेरा…
धूल सी बिखरी
साँझ से पसरी,,
फिर भी क्यों?
शूल सी चुभती-
पीड़ा मेरी…
मुझसे हारी,
सारी हाला,
फिर भी क्यों?
मुझपे हावी,
अहंकार मेरा…
झूठ शायद,
कल्पित रहा,
फिर भी क्यों?
सच सा सलोना –
ख़्वाब मेरा…
जग से हारा,
ठगा बेचारा,
फिर भी क्यों?
मुझे जिताता-
जुनून मेरा…
सबसे उलझता,
ख़ुद से झगड़ता,
फिर भी क्यों
मुझे संभालता-
फ़ितूर मेरा…
~समर~
समर भीड़ में उलझा हुआ एक चेहरा है |
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