कर्म-युद्ध में हमेशा
ख़ुद को तन्हा ही पाओगे,
ईश्वर-भगवान होंगे-
पर देख ना पाओगे!
लगेगा किसी पल यह भी-
कि कहीं तुम ही तो ग़लत नहीं ?
युद्ध के आरंभ से पहले,
मन में सौ ख़याल लाओगेl
जीत मिली-
तो सब से स्नेह पाओगे,
अगर हारे-
तो कोसे जाओगेl
दुनिया की रीत है,
गाँठ बाँध लो,
अकेले ही आये हो ,
अकेले ही जाओगे|
हर बार भयभीत करेगी दुनिया,
कि मारे जाओगे;
और डर गये अगर,
तो जी कर भी क्या पाओगे?
धरती के करम,
सारे तौले जाएँगे,
स्वर्ग या नरक –
किसे अपना आख़िरी घर बनाओगे?
~यतिन “शेफ़्ता”~
ज़हीन भी, और नटखट भी , यतिन “शेफ़्ता” ने अपने बारे में हमें कुछ यूँ बताया-
“मैं नए ज़माने में कुछ पुराना सा हूँ ,
कुछ बेढंगा कुछ आवारा सा हूँ ,
कि महफिलों में शराब की-
चाय की प्याली सा हूँ.
पुराने गानें आज भी ज्यादा भाते हैं ,
पॉप के ज़माने में नुसरत साब की क़व्वाली सा हूँ
इस दौड़ती हुई दुनिया में,
धीमा चलने वाला राही सा हूँ…”
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